श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.38.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 38 · अथाष्टात्रिंशोऽध्यायः

अथावरूढः सपदीशयो रथात्

प्रधानपुंसोश्‍चरणं स्वलब्धये।

धिया धृतं योगिभिरप्यहं ध्रुवं

नमस्य आभ्यां च सखीन् वनौकसः॥ १५

athāvarūḍhaḥ sapadīśayo rathāt

pradhānapuṃsoścaraṇaṃ svalabdhaye|

dhiyā dhṛtaṃ yogibhirapyahaṃ dhruvaṃ

namasya ābhyāṃ ca sakhīn vanaukasaḥ|| 15

अर्थ

जब मैं उन्हें देखूँगा तब सर्वश्रेष्ठ पुरुष बलराम तथा श्रीकृष्णके चरणोंमें नमस्कार करनेके लिये तुरंत रथसे कूद पड़ूँगा। उनके चरण पकड़ लूँगा। ओह! उनके चरण कितने दुर्लभ हैं! बड़े-बड़े योगी-यति आत्म-साक्षात्कारके लिये मन-ही-मन अपने हृदयमें उनके चरणोंकी धारणा करते हैं और मैं तो उन्हें प्रत्यक्ष पा जाऊँगा और लोट जाऊँगा उनपर। उन दोनोंके साथ ही उनके वनवासी सखा एक-एक ग्वालबालके चरणोंकी भी वन्दना करूँगा॥ १५॥✎ 1920

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1920 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): वक्ष:-स्थलपर → वक्षःस्थलपर

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