श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.38.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 38 · अथाष्टात्रिंशोऽध्यायः

अप्यङ्‌घ्रिमूलेऽवहितं कृतांजलिं

मामीक्षिता सस्मितमार्द्रया दृशा।

सपद्यपध्वस्तसमस्तकिल्बिषो

वोढा मुदं वीतविशंक ऊर्जिताम्॥ १९

apyaṅghrimūle'vahitaṃ kṛtāṃjaliṃ

māmīkṣitā sasmitamārdrayā dṛśā|

sapadyapadhvastasamastakilbiṣo

voḍhā mudaṃ vītaviśaṃka ūrjitām|| 19

अर्थ

तब मेरी शंका व्यर्थ है। अवश्य ही मैं उनके चरणोंमें हाथ जोड़कर विनीतभावसे खड़ा हो जाऊँगा। वे मुसकराते हुए दयाभरी स्निग्ध दृष्टिसे मेरी ओर देखेंगे। उस समय मेरे जन्म-जन्मके समस्त अशुभ संस्कार उसी क्षण नष्ट हो जायँगे और मैं निःशंक होकर सदाके लिये परमानन्दमें म‌ग्‍न हो जाऊँगा॥ १९॥✎ 1920

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1920 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): वक्ष:-स्थलपर → वक्षःस्थलपर

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