तब मेरी शंका व्यर्थ है। अवश्य ही मैं उनके चरणोंमें हाथ जोड़कर विनीतभावसे खड़ा हो जाऊँगा। वे मुसकराते हुए दयाभरी स्निग्ध दृष्टिसे मेरी ओर देखेंगे। उस समय मेरे जन्म-जन्मके समस्त अशुभ संस्कार उसी क्षण नष्ट हो जायँगे और मैं निःशंक होकर सदाके लिये परमानन्दमें मग्न हो जाऊँगा॥ १९॥✎ 1920
अप्यङ्घ्रिमूलेऽवहितं कृतांजलिं
मामीक्षिता सस्मितमार्द्रया दृशा।
सपद्यपध्वस्तसमस्तकिल्बिषो
वोढा मुदं वीतविशंक ऊर्जिताम्॥ १९
तब मेरी शंका व्यर्थ है। अवश्य ही मैं उनके चरणोंमें हाथ जोड़कर विनीतभावसे खड़ा हो जाऊँगा। वे मुसकराते हुए दयाभरी स्निग्ध दृष्टिसे मेरी ओर देखेंगे। उस समय मेरे जन्म-जन्मके समस्त अशुभ संस्कार उसी क्षण नष्ट हो जायँगे और मैं निःशंक होकर सदाके लिये परमानन्दमें मग्न हो जाऊँगा॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.38.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 369) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/38/19/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1920 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): वक्ष:-स्थलपर → वक्षःस्थलपर