श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.38.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 38 · अथाष्टात्रिंशोऽध्यायः

किं मयाऽऽचरितं भद्रं किं तप्तं परमं तपः।

किं वाथाप्यर्हते दत्तं यद् द्रक्ष्याम्यद्य केशवम्॥ ३

kiṃ mayā''caritaṃ bhadraṃ kiṃ taptaṃ paramaṃ tapaḥ|

kiṃ vāthāpyarhate dattaṃ yad drakṣyāmyadya keśavam|| 3

अर्थ

‘मैंने ऐसा कौन-सा शुभ कर्म किया है, ऐसी कौन-सी श्रेष्ठ तपस्या की है अथवा किसी सत्पात्रको ऐसा कौन-सा महत्त्वपूर्ण दान दिया है जिसके फलस्वरूप आज मैं भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन करूँगा॥ ३॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें