श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.38.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 38 · अथाष्टात्रिंशोऽध्यायः

उदाररुचिरक्रीडौ स्रग्विणौ वनमालिनौ।

पुण्यगन्धानुलिप्तांगौ स्नातौ विरजवाससौ॥ ३१

udārarucirakrīḍau sragviṇau vanamālinau|

puṇyagandhānuliptāṃgau snātau virajavāsasau|| 31

अर्थ

उनकी एक-एक लीला उदारता और सुन्दर कलासे भरी थी। गलेमें वनमाला और मणियोंके हार जगमगा रहे थे। उन्होंने अभी-अभी स्नान करके निर्मल वस्त्र पहने थे और शरीरमें पवित्र अंगराग तथा चन्दनका लेप किया था॥ ३१॥

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