परंतु नहीं, मुझ अधमको भी भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन होंगे ही। क्योंकि जैसे नदीमें बहते हुए तिनके कभी-कभी इस पारसे उस पार लग जाते हैं, वैसे ही समयके प्रवाहसे भी कहीं कोई इस संसारसागरको पार कर सकता है॥ ५॥✎ 1920
मैवं ममाधमस्यापि स्यादेवाच्युतदर्शनम्।
ह्रियमाणः कालनद्या क्वचित्तरति कश्चन॥ ५
परंतु नहीं, मुझ अधमको भी भगवान् श्रीकृष्णके दर्शन होंगे ही। क्योंकि जैसे नदीमें बहते हुए तिनके कभी-कभी इस पारसे उस पार लग जाते हैं, वैसे ही समयके प्रवाहसे भी कहीं कोई इस संसारसागरको पार कर सकता है॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.38.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 367) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/38/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1920 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): वक्ष:-स्थलपर → वक्षःस्थलपर