॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.38.9
द्रक्ष्यामि नूनं सुकपोलनासिकं
स्मितावलोकारुणकञ्जलोचनम् ।
मुखं मुकुन्दस्य गुडालकावृतं
प्रदक्षिणं मे प्रचरन्ति वै मृगाः॥ ९
drakṣyāmi nūnaṃ sukapolanāsikaṃ
smitāvalokāruṇakañjalocanam |
mukhaṃ mukundasya guḍālakāvṛtaṃ
pradakṣiṇaṃ me pracaranti vai mṛgāḥ|| 9
अर्थ
मैं अवश्य-अवश्य उनका दर्शन करूँगा। मरकतमणिके समान सुस्निग्ध कान्तिमान् उनके कोमल कपोल हैं, तोतेकी ठोरके समान नुकीली नासिका है, होठोंपर मन्द-मन्द मुसकान, प्रेमभरी चितवन, कमल-से कोमल रतनारे लोचन और कपोलोंपर घुँघराली अलकें लटक रही हैं। मैं प्रेम और मुक्तिके परम दानी श्रीमुकुन्दके उस मुखकमलका आज अवश्य दर्शन करूँगा। क्योंकि हरिन मेरी दायीं ओरसे निकल रहे हैं॥ ९॥✎ 1920