श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.39.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 39 · अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

यस्त्वं प्रदर्श्यासितकुन्तलावृतं

मुकुन्दवक्त्रं सुकपोलमुन्‍नसम्।

शोकापनोदस्मितलेशसुन्दरं

करोषि पारोक्ष्यमसाधु ते कृतम्॥ २०

yastvaṃ pradarśyāsitakuntalāvṛtaṃ

mukundavaktraṃ sukapolamunnasam|

śokāpanodasmitaleśasundaraṃ

karoṣi pārokṣyamasādhu te kṛtam|| 20

अर्थ

यह कितने दुःखकी बात है! विधाता! तुमने पहले हमें प्रेमका वितरण करनेवाले श्यामसुन्दरका मुखकमल दिखलाया। कितना सुन्दर है वह! काले-काले घुँघराले बाल कपोलोंपर झलक रहे हैं। मरकतमणि-से चिकने सुस्निग्ध कपोल और तोतेकी चोंच-सी सुन्दर नासिका तथा अधरोंपर मन्द-मन्द मुसकानकी सुन्दर रेखा, जो सारे शोकोंको तत्क्षण भगा देती है। विधाता! तुमने एक बार तो हमें वह परम सुन्दर मुखकमल दिखाया और अब उसे ही हमारी आँखोंसे ओझल कर रहे हो! सचमुच तुम्हारी यह करतूत बहुत ही अनुचित है॥ २०॥

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