॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.39.30
योऽह्नः क्षये व्रजमनन्तसखः परीतो
गोपैर्विशन् खुररजश्छुरितालकस्रक्।
वेणुं क्वणन् स्मितकटाक्षनिरीक्षणेन
चित्तं क्षिणोत्यमुमृते नु कथं भवेम॥ ३०
yo'hnaḥ kṣaye vrajamanantasakhaḥ parīto
gopairviśan khurarajaśchuritālakasrak|
veṇuṃ kvaṇan smitakaṭākṣanirīkṣaṇena
cittaṃ kṣiṇotyamumṛte nu kathaṃ bhavema|| 30
अर्थ
एक दिनकी नहीं, प्रतिदिनकी बात है, सायंकालमें प्रतिदिन वे ग्वालबालोंसे घिरे हुए बलरामजीके साथ वनसे गौएँ चराकर लौटते हैं। उनकी काली-काली घुँघराली अलकें और गलेके पुष्पहार गौओंके खुरकी रजसे ढके रहते हैं। वे बाँसुरी बजाते हुए अपनी मन्द-मन्द मुसकान और तिरछी चितवनसे देख-देखकर हमारे हृदयको बेध डालते हैं। उनके बिना भला, हम कैसे जी सकेंगी?॥ ३०॥