श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.39.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 39 · अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

अक्रूरस्तावुपामन्त्र्य निवेश्य च रथोपरि।✎ 2096

कालिन्द्या ह्रदमागत्य स्नानं विधिवदाचरत्॥ ४० ✎ 1167

akrūrastāvupāmantrya niveśya ca rathopari|

kālindyā hradamāgatya snānaṃ vidhivadācarat|| 40

अर्थ

अक्रूरजीने दोनों भाइयोंको रथपर बैठाकर उनसे आज्ञा ली और यमुनाजीके कुण्ड (अनन्त—तीर्थ या ब्रह्मह्रद) पर आकर वे विधिपूर्वक स्नान करने लगे॥ ४०॥✎ 1433 1434

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #1167 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृदमागत्य → ह्रदमागत्य
  • #1433 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ब्रह्महृद) → ब्रह्मह्रद)
  • #1434 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मरकत-मणिके → मरकतमणिके
  • #2096 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): मन्त्रॺ निवे → मन्त्र्य निवे

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