कालिन्द्या ह्रदमागत्य स्नानं विधिवदाचरत्॥ ४० ✎ 1167
akrūrastāvupāmantrya niveśya ca rathopari|
kālindyā hradamāgatya snānaṃ vidhivadācarat|| 40
अर्थ
अक्रूरजीने दोनों भाइयोंको रथपर बैठाकर उनसे आज्ञा ली और यमुनाजीके कुण्ड (अनन्त—तीर्थ या ब्रह्मह्रद) पर आकर वे विधिपूर्वक स्नान करने लगे॥ ४०॥✎ 14331434
अक्रूरस्तावुपामन्त्र्य निवेश्य च रथोपरि।
कालिन्द्या ह्रदमागत्य स्नानं विधिवदाचरत्॥ ४०
अक्रूरजीने दोनों भाइयोंको रथपर बैठाकर उनसे आज्ञा ली और यमुनाजीके कुण्ड (अनन्त—तीर्थ या ब्रह्मह्रद) पर आकर वे विधिपूर्वक स्नान करने लगे॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.39.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 379) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/40/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
#1167 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृदमागत्य → ह्रदमागत्य
#1433 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ब्रह्महृद) → ब्रह्मह्रद)