तर्हि स्वित् स्यन्दने न स्त इत्युन्मज्ज्य व्यचष्ट सः॥ ४२
tau rathasthau kathamiha sutāvānakadundubheḥ|
tarhi svit syandane na sta ityunmajjya vyacaṣṭa saḥ|| 42
अर्थ
अब उनके मनमें यह शंका हुई कि ‘वसुदेवजीके पुत्रोंको तो मैं रथपर बैठा आया हूँ, अब वे यहाँ जलमें कैसे आ गये? जब यहाँ हैं तो शायद रथपर नहीं होंगे।’ ऐसा सोचकर उन्होंने सिर बाहर निकालकर देखा॥ ४२॥✎ 14331434
तौ रथस्थौ कथमिह सुतावानकदुन्दुभेः।
तर्हि स्वित् स्यन्दने न स्त इत्युन्मज्ज्य व्यचष्ट सः॥ ४२
अब उनके मनमें यह शंका हुई कि ‘वसुदेवजीके पुत्रोंको तो मैं रथपर बैठा आया हूँ, अब वे यहाँ जलमें कैसे आ गये? जब यहाँ हैं तो शायद रथपर नहीं होंगे।’ ऐसा सोचकर उन्होंने सिर बाहर निकालकर देखा॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.39.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 379) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/42/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1433 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ब्रह्महृद) → ब्रह्मह्रद)