हमारा नाममात्रका मामा कंस तो हमारे कुलके लिये एक भयंकर व्याधि है। जबतक उसकी बढ़ती हो रही है, तबतक हम अपने वंशवालों और उनके बाल-बच्चोंका कुशल-मंगल क्या पूछें॥ ५॥✎ 1929
किं नु नः कुशलं पृच्छे एधमाने कुलामये।
कंसे मातुलनाम्न्यङ्ग स्वानां नस्तत्प्रजासु च॥ ५
हमारा नाममात्रका मामा कंस तो हमारे कुलके लिये एक भयंकर व्याधि है। जबतक उसकी बढ़ती हो रही है, तबतक हम अपने वंशवालों और उनके बाल-बच्चोंका कुशल-मंगल क्या पूछें॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.39.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 373) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/39/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1929 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): सौम्य-स्वभाव → सौम्यस्वभाव