मैं बहुत दिनोंसे चाहता था कि आप-लोगोंमेंसे किसी-न-किसीका दर्शन हो। यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि आज मेरी वह अभिलाषा पूरी हो गयी। सौम्यस्वभाव चाचाजी! अब आप कृपा करके यह बतलाइये कि आपका शुभागमन किस निमित्तसे हुआ?॥ ७॥✎ 1929
दिष्ट्याद्य दर्शनं स्वानां मह्यं वः सौम्य कांक्षितम्।
संजातं वर्ण्यतां तात तवागमनकारणम्॥ ७
मैं बहुत दिनोंसे चाहता था कि आप-लोगोंमेंसे किसी-न-किसीका दर्शन हो। यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि आज मेरी वह अभिलाषा पूरी हो गयी। सौम्यस्वभाव चाचाजी! अब आप कृपा करके यह बतलाइये कि आपका शुभागमन किस निमित्तसे हुआ?॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.39.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 374) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/7/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1929 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): सौम्य-स्वभाव → सौम्यस्वभाव