श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.40.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 40 · अथ चत्वारिंशोऽध्यायः

नमस्ते वासुदेवाय सर्वभूतक्षयाय च।

हृषीकेश नमस्तुभ्यं प्रपन्‍नं पाहि मां प्रभो॥ ३०

namaste vāsudevāya sarvabhūtakṣayāya ca|

hṛṣīkeśa namastubhyaṃ prapannaṃ pāhi māṃ prabho|| 30

अर्थ

प्रभो! आप ही वासुदेव, आप ही समस्त जीवोंके आश्रय (संकर्षण) हैं; तथा आप ही बुद्धि और मनके अधिष्ठातृ-देवता हृषीकेश (प्रद्युम्‍न और अनिरुद्ध) हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ। प्रभो! आप मुझ शरणागतकी रक्षा कीजिये॥ ३०॥✎ 1671

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे
पूर्वार्धेऽक्रूरस्तुतिर्नाम चत्वारिंशोऽध्यायः॥ ४०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1671 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विज्ञान-घन → विज्ञानघन

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