श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.41.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 41 · अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः

अवनिज्याङ्‌घ्रियुगलमासीच्छ्लोक्यो बलिर्महान्।

ऐश्‍वर्यमतुलं लेभे गतिं चैकान्तिनां तु या॥ १४

avanijyāṅghriyugalamāsīcchlokyo balirmahān|

aiśvaryamatulaṃ lebhe gatiṃ caikāntināṃ tu yā|| 14

अर्थ

प्रभो! आपके युगल चरणोंको पखारकर महात्मा बलिने वह यश प्राप्त किया, जिसका गान सन्त पुरुष करते हैं। केवल यश ही नहीं—उन्हें अतुलनीय ऐश्‍वर्य तथा वह गति प्राप्त हुई, जो अनन्य प्रेमी भक्तोंको प्राप्त होती है॥ १४॥✎ 2101

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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