श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.41.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 41 · अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः

यत्राद्भुतानि सर्वाणि भूमौ वियति वा जले।

तं त्वानुपश्यतो ब्रह्मन् किं मे दृष्टमिहाद्भुतम्॥ ५

yatrādbhutāni sarvāṇi bhūmau viyati vā jale|

taṃ tvānupaśyato brahman kiṃ me dṛṣṭamihādbhutam|| 5

अर्थ

भगवन्! जितनी भी अद्भुत वस्तुएँ हैं, वे पृथ्वीमें हों या जल अथवा आकाशमें—सब-की-सब जिनमें हैं, उन्हीं आपको मैं देख रहा हूँ! फिर भला, मैंने यहाँ अद्भुत वस्तु कौन-सी देखी?॥ ५॥✎ 1672

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1672 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: गान्दिनी-नन्दन → गान्दिनीनन्दन

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