श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.43.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 43 · अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः

प्रजा भोजपतेरस्य वयं चापि वनेचराः।

करवाम प्रियं नित्यं तन्‍नः परमनुग्रहः॥ ३७

prajā bhojapaterasya vayaṃ cāpi vanecarāḥ|

karavāma priyaṃ nityaṃ tannaḥ paramanugrahaḥ|| 37

अर्थ

‘चाणूर! हम भी इन भोजराज कंसकी वनवासी प्रजा हैं। हमें इनको प्रसन्‍न करनेका प्रयत्‍न अवश्य करना चाहिये। इसीमें हमारा कल्याण है॥ ३७॥

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