॥ श्रीहरिः ॥
पुच्छे प्रगृह्यातिबलं धनुषः पंचविंशतिम्।
विचकर्ष यथा नागं सुपर्ण इव लीलया॥ ८
pucche pragṛhyātibalaṃ dhanuṣaḥ paṃcaviṃśatim|
vicakarṣa yathā nāgaṃ suparṇa iva līlayā|| 8
अर्थ
इसके बाद भगवान् उस बलवान् हाथीकी पूँछ पकड़कर खेल-खेलमें ही उसे सौ हाथतक पीछे घसीट लाये; जैसे गरुड़ साँपको घसीट लाते हैं॥ ८॥
पुच्छे प्रगृह्यातिबलं धनुषः पंचविंशतिम्।
विचकर्ष यथा नागं सुपर्ण इव लीलया॥ ८
इसके बाद भगवान् उस बलवान् हाथीकी पूँछ पकड़कर खेल-खेलमें ही उसे सौ हाथतक पीछे घसीट लाये; जैसे गरुड़ साँपको घसीट लाते हैं॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.43.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 398) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/43/8/