muṣṭikaṃ prati sāmarṣaṃ hāsasaṃrambhaśobhitam|| 12
अर्थ
सखियो! क्या तुम नहीं देख रही हो कि बलरामजीका मुख मुष्टिकके प्रति क्रोधके कारण कुछ-कुछ लाल लोचनोंसे युक्त हो रहा है! फिर भी हास्यका अनिरुद्ध आवेग कितना सुन्दर लग रहा है॥ १२॥
किं न पश्यत रामस्य मुखमाताम्रलोचनम्।
मुष्टिकं प्रति सामर्षं हाससंरम्भशोभितम्॥ १२
सखियो! क्या तुम नहीं देख रही हो कि बलरामजीका मुख मुष्टिकके प्रति क्रोधके कारण कुछ-कुछ लाल लोचनोंसे युक्त हो रहा है! फिर भी हास्यका अनिरुद्ध आवेग कितना सुन्दर लग रहा है॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.44.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 403) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/44/12/