॥ श्रीहरिः ॥
हस्ताभ्यां हस्तयोर्बद्ध्वा पद्भ्यामेव च पादयोः।
विचकर्षतुरन्योन्यं प्रसह्य विजिगीषया॥ २
hastābhyāṃ hastayorbaddhvā padbhyāmeva ca pādayoḥ|
vicakarṣaturanyonyaṃ prasahya vijigīṣayā|| 2
अर्थ
वे लोग एक-दूसरेको जीत लेनेकी इच्छासे हाथसे हाथ बाँधकर और पैरोंमें पैर अड़ाकर बलपूर्वक अपनी-अपनी ओर खींचने लगे॥ २॥
हस्ताभ्यां हस्तयोर्बद्ध्वा पद्भ्यामेव च पादयोः।
विचकर्षतुरन्योन्यं प्रसह्य विजिगीषया॥ २
वे लोग एक-दूसरेको जीत लेनेकी इच्छासे हाथसे हाथ बाँधकर और पैरोंमें पैर अड़ाकर बलपूर्वक अपनी-अपनी ओर खींचने लगे॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.44.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 402) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/44/2/