भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामकी इस अद्भुत लीलाको देखकर सभी दर्शकोंको बड़ा आनन्द हुआ। श्रेष्ठ ब्राह्मण और साधु पुरुष ‘धन्य है, धन्य है’—इस प्रकार कहकर प्रशंसा करने लगे। परन्तु कंसको इससे बड़ा दुःख हुआ। वह और भी चिढ़ गया॥ ३०॥
जनाः प्रजहृषुः सर्वे कर्मणा रामकृष्णयोः।
ऋते कंसं विप्रमुख्याः साधवः साधु साध्विति॥ ३०
भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामकी इस अद्भुत लीलाको देखकर सभी दर्शकोंको बड़ा आनन्द हुआ। श्रेष्ठ ब्राह्मण और साधु पुरुष ‘धन्य है, धन्य है’—इस प्रकार कहकर प्रशंसा करने लगे। परन्तु कंसको इससे बड़ा दुःख हुआ। वह और भी चिढ़ गया॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.44.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 405) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/30/