‘हा नाथ! हे प्यारे! हे धर्मज्ञ! हे करुणामय! हे अनाथवत्सल! आपकी मृत्युसे हम सबकी मृत्यु हो गयी। आज हमारे घर उजड़ गये। हमारी सन्तान अनाथ हो गयी॥ ४५॥
हा नाथ प्रिय धर्मज्ञ करुणानाथवत्सल।
त्वया हतेन निहता वयं ते सगृहप्रजाः॥ ४५
‘हा नाथ! हे प्यारे! हे धर्मज्ञ! हे करुणामय! हे अनाथवत्सल! आपकी मृत्युसे हम सबकी मृत्यु हो गयी। आज हमारे घर उजड़ गये। हमारी सन्तान अनाथ हो गयी॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.44.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 407) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/45/