श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.44.45

दशम स्कन्ध · अध्याय 44 · अथ चतुश्‍चत्वारिंशोऽध्यायः

हा नाथ प्रिय धर्मज्ञ करुणानाथवत्सल।

त्वया हतेन निहता वयं ते सगृहप्रजाः॥ ४५

hā nātha priya dharmajña karuṇānāthavatsala|

tvayā hatena nihatā vayaṃ te sagṛhaprajāḥ|| 45

अर्थ

‘हा नाथ! हे प्यारे! हे धर्मज्ञ! हे करुणामय! हे अनाथवत्सल! आपकी मृत्युसे हम सबकी मृत्यु हो गयी। आज हमारे घर उजड़ गये। हमारी सन्तान अनाथ हो गयी॥ ४५॥

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