श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.44.47

दशम स्कन्ध · अध्याय 44 · अथ चतुश्‍चत्वारिंशोऽध्यायः

अनागसां त्वं भूतानां कृतवान् द्रोहमुल्बणम्।

तेनेमां भो दशां नीतो भूतध्रुक् को लभेत शम्॥ ४७

anāgasāṃ tvaṃ bhūtānāṃ kṛtavān drohamulbaṇam|

tenemāṃ bho daśāṃ nīto bhūtadhruk ko labheta śam|| 47

अर्थ

स्वामी! आपने निरपराध प्राणियोंके साथ घोर द्रोह किया था, अन्याय किया था; इसीसे आपकी यह गति हुई। सच है, जो जगत‍्के जीवोंसे द्रोह करता है, उनका अहित करता है, ऐसा कौन पुरुष शान्ति पा सकता है?॥ ४७॥

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