राजन्! वे स्नेह-पाशसे बँधकर पूर्णतः मोहित हो गये और आँसुओंकी धारासे उनका अभिषेक करने लगे। यहाँतक कि आँसुओंके कारण गला रुँध जानेसे वे कुछ बोल भी न सके॥ ११॥
सिंचन्तावश्रुधाराभिः स्नेहपाशेन चावृतौ।
न किंचिदूचतू राजन् बाष्पकण्ठौ विमोहितौ॥ ११
राजन्! वे स्नेह-पाशसे बँधकर पूर्णतः मोहित हो गये और आँसुओंकी धारासे उनका अभिषेक करने लगे। यहाँतक कि आँसुओंके कारण गला रुँध जानेसे वे कुछ बोल भी न सके॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.45.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 409) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/11/