जब मैं सेवक बनकर आपकी सेवा करता रहूँगा, तब बड़े-बड़े देवता भी सिर झुकाकर आपको भेंट देंगे।’ दूसरे नरपतियोंके बारेमें तो कहना ही क्या है॥ १४॥
मयि भृत्य उपासीने भवतो विबुधादयः।
बलिं हरन्त्यवनताः किमुतान्ये नराधिपाः॥ १४
जब मैं सेवक बनकर आपकी सेवा करता रहूँगा, तब बड़े-बड़े देवता भी सिर झुकाकर आपको भेंट देंगे।’ दूसरे नरपतियोंके बारेमें तो कहना ही क्या है॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.45.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 409) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/14/