श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

वीक्षन्तोऽहरहः प्रीता मुकुन्दवदनाम्बुजम्।

नित्यं प्रमुदितं श्रीमत् सदयस्मितवीक्षणम्॥ १८

vīkṣanto'harahaḥ prītā mukundavadanāmbujam|

nityaṃ pramuditaṃ śrīmat sadayasmitavīkṣaṇam|| 18

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णका वदन आनन्दका सदन है। वह नित्य प्रफुल्लित, कभी न कुम्हलानेवाला कमल है। उसका सौन्दर्य अपार है। सदय हास और चितवन उसपर सदा नाचती रहती है। यदुवंशी दिन-प्रतिदिन उसका दर्शन करके आनन्दम‌ग्‍न रहते॥ १८॥

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