श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

तेभ्योऽदाद् दक्षिणा गावो रुक्ममालाः स्वलंकृताः।

स्वलंकृतेभ्यः संपूज्य सवत्साः क्षौममालिनीः॥ २७

tebhyo'dād dakṣiṇā gāvo rukmamālāḥ svalaṃkṛtāḥ|

svalaṃkṛtebhyaḥ saṃpūjya savatsāḥ kṣaumamālinīḥ|| 27

अर्थ

उन्होंने विविध प्रकारके वस्त्र और आभूषणोंसे ब्राह्मणोंका सत्कार करके उन्हें बहुत-सी दक्षिणा तथा बछड़ोंवाली गौएँ दीं। सभी गौएँ गलेमें सोनेकी माला पहने हुए थीं तथा और भी बहुतसे आभूषणों एवं रेशमी वस्त्रोंकी मालाओंसे विभूषित थीं॥ २७॥

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