उन्होंने विविध प्रकारके वस्त्र और आभूषणोंसे ब्राह्मणोंका सत्कार करके उन्हें बहुत-सी दक्षिणा तथा बछड़ोंवाली गौएँ दीं। सभी गौएँ गलेमें सोनेकी माला पहने हुए थीं तथा और भी बहुतसे आभूषणों एवं रेशमी वस्त्रोंकी मालाओंसे विभूषित थीं॥ २७॥
तेभ्योऽदाद् दक्षिणा गावो रुक्ममालाः स्वलंकृताः।
स्वलंकृतेभ्यः संपूज्य सवत्साः क्षौममालिनीः॥ २७
उन्होंने विविध प्रकारके वस्त्र और आभूषणोंसे ब्राह्मणोंका सत्कार करके उन्हें बहुत-सी दक्षिणा तथा बछड़ोंवाली गौएँ दीं। सभी गौएँ गलेमें सोनेकी माला पहने हुए थीं तथा और भी बहुतसे आभूषणों एवं रेशमी वस्त्रोंकी मालाओंसे विभूषित थीं॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.45.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 411) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/27/