श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

द्विजस्तयोस्तं महिमानमद्भुतं

संलक्ष्य राजन्‍नतिमानुषीं मतिम्।

सम्मन्त्र्य पत्‍न्या स महार्णवे मृतं ✎ 2103

बालं प्रभासे वरयाम्बभूव ह॥ ३७

dvijastayostaṃ mahimānamadbhutaṃ

saṃlakṣya rājannatimānuṣīṃ matim|

sammantrya patnyā sa mahārṇave mṛtaṃ

bālaṃ prabhāse varayāmbabhūva ha|| 37

अर्थ

महाराज! सान्दीपनि मुनिने उनकी अद्भुत महिमा और अलौकिक बुद्धिका अनुभव कर लिया था। इसलिये उन्होंने अपनी पत्‍नीसे सलाह करके यह गुरुदक्षिणा माँगी कि ‘प्रभासक्षेत्रमें हमारा बालक समुद्रमें डूबकर मर गया था, उसे तुमलोग ला दो’॥ ३७॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2103 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): म्मन्त्रॺ पत्‍ → म्मन्त्र्य पत्‍

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