श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

यस्तयोरात्मजः कल्प आत्मना च धनेन च।

वृत्तिं न दद्यात्तं प्रेत्य स्वमांसं खादयन्ति हि॥ ६

yastayorātmajaḥ kalpa ātmanā ca dhanena ca|

vṛttiṃ na dadyāttaṃ pretya svamāṃsaṃ khādayanti hi|| 6

अर्थ

जो पुत्र सामर्थ्य रहते भी अपने माँ-बापकी शरीर और धनसे सेवा नहीं करता, उसके मरनेपर यमदूत उसे उसके अपने शरीरका मांस खिलाते हैं॥ ६॥

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