॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.46.18
अपि स्मरति नः कृष्णो मातरं सुहृदः सखीन्।
गोपान् व्रजं चात्मनाथं गावो वृन्दावनं गिरिम्॥ १८
api smarati naḥ kṛṣṇo mātaraṃ suhṛdaḥ sakhīn|
gopān vrajaṃ cātmanāthaṃ gāvo vṛndāvanaṃ girim|| 18
अर्थ
अच्छा उद्धवजी! श्रीकृष्ण कभी हमलोगोंकी भी याद करते हैं? यह उनकी माँ हैं, स्वजन-सम्बन्धी हैं, सखा हैं, गोप हैं; उन्हींको अपना स्वामी और सर्वस्व माननेवाला यह व्रज है; उन्हींकी गौएँ, वृन्दावन और यह गिरिराज है, क्या वे कभी इनका स्मरण करते हैं?॥ १८॥