श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.46.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 46 · अथ षट्चत्वारिंशोऽध्यायः

ता मन्मनस्का मत्प्राणा मदर्थे त्यक्तदैहिकाः।

मामेव दयितं प्रेष्ठमात्मानं मनसा गताः।

ये त्यक्तलोकधर्माश्‍च मदर्थे तान् बिभर्म्यहम्॥ ४

tā manmanaskā matprāṇā madarthe tyaktadaihikāḥ|

māmeva dayitaṃ preṣṭhamātmānaṃ manasā gatāḥ|

ye tyaktalokadharmāśca madarthe tān bibharmyaham|| 4

अर्थ

प्यारे उद्धव! गोपियोंका मन नित्य-निरन्तर मुझमें ही लगा रहता है। उनके प्राण, उनका जीवन, उनका सर्वस्व मैं ही हूँ। मेरे लिये उन्होंने अपने पति-पुत्र आदि सभी सगे-सम्बन्धियोंको छोड़ दिया है। उन्होंने बुद्धिसे भी मुझीको अपना प्यारा, अपना प्रियतम—नहीं, नहीं; अपना आत्मा मान रखा है। मेरा यह व्रत है कि जो लोग मेरे लिये लौकिक और पारलौकिक धर्मोंको छोड़ देते हैं, उनका भरण-पोषण मैं स्वयं करता हूँ॥ ४॥

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