॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.46.41
यथा भ्रमरिकादृष्ट्या भ्राम्यतीव महीयते।
चित्ते कर्तरि तत्रात्मा कर्तेवाहंधिया स्मृतः॥ ४१
yathā bhramarikādṛṣṭyā bhrāmyatīva mahīyate|
citte kartari tatrātmā kartevāhaṃdhiyā smṛtaḥ|| 41
अर्थ
जब बच्चे घुमरीपरेता खेलने लगते हैं या मनुष्य वेगसे चक्कर लगाने लगते हैं, तब उन्हें सारी पृथ्वी घूमती हुई जान पड़ती है। वैसे ही वास्तवमें सब कुछ करनेवाला चित्त ही है; परन्तु उस चित्तमें अहंबुद्धि हो जानेके कारण, भ्रमवश उसे आत्मा—अपना ‘मैं’ समझ लेनेके कारण, जीव अपनेको कर्ता समझने लगता है॥ ४१॥