॥ श्रीहरिः ॥
भगवत्युदिते सूर्ये नन्दद्वारि व्रजौकसः।
दृष्ट्वा रथं शातकौम्भं कस्यायमिति चाब्रुवन्॥ ४७
bhagavatyudite sūrye nandadvāri vrajaukasaḥ|
dṛṣṭvā rathaṃ śātakaumbhaṃ kasyāyamiti cābruvan|| 47
अर्थ
जब भगवान् भुवनभास्करका उदय हुआ, तब व्रजांगनाओंने देखा कि नन्दबाबाके दरवाजेपर एक सोनेका रथ खड़ा है। वे एक-दूसरेसे पूछने लगीं ‘यह किसका रथ है?’॥ ४७॥
भगवत्युदिते सूर्ये नन्दद्वारि व्रजौकसः।
दृष्ट्वा रथं शातकौम्भं कस्यायमिति चाब्रुवन्॥ ४७
जब भगवान् भुवनभास्करका उदय हुआ, तब व्रजांगनाओंने देखा कि नन्दबाबाके दरवाजेपर एक सोनेका रथ खड़ा है। वे एक-दूसरेसे पूछने लगीं ‘यह किसका रथ है?’॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.46.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 421) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/46/47/