श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

अपि बत मधुपुर्यामार्यपुत्रोऽधुनाऽऽस्ते

स्मरति स पितृगेहान् सौम्य बन्धूंश्‍च गोपान्।

क्वचिदपि स कथा नः किंकरीणां गृणीते

भुजमगुरुसुगन्धं मूर्ध्‍न्‍यधास्यत् कदा नु॥ २१

api bata madhupuryāmāryaputro'dhunā''ste

smarati sa pitṛgehān saumya bandhūṃśca gopān|

kvacidapi sa kathā naḥ kiṃkarīṇāṃ gṛṇīte

bhujamagurusugandhaṃ mūrdhnyadhāsyat kadā nu|| 21

अर्थ

अच्छा, हमारे प्रियतमके प्यारे दूत मधुकर! हमें यह बतलाओ कि आर्यपुत्र भगवान् श्रीकृष्ण गुरुकुलसे लौटकर मधुपुरीमें अब सुखसे तो हैं न? क्या वे कभी नन्दबाबा, यशोदारानी, यहाँके घर, सगे-सम्बन्धी और ग्वालबालोंकी भी याद करते हैं? और क्या हम दासियोंकी भी कोई बात कभी चलाते हैं? प्यारे भ्रमर! हमें यह भी बतलाओ कि कभी वे अपनी अगरके समान दिव्य सुगन्धसे युक्त भुजा हमारे सिरोंपर रखेंगे? क्या हमारे जीवनमें कभी ऐसा शुभ अवसर भी आयेगा?॥ २१॥

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