श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

भवतीनां वियोगो मे न हि सर्वात्मना क्‍वचित्।

यथा भूतानि भूतेषु खं वाय्वग्‍निर्जलं मही।

तथाहं च मनःप्राणभूतेन्द्रियगुणाश्रयः॥ २९

bhavatīnāṃ viyogo me na hi sarvātmanā kvacit|

yathā bhūtāni bhūteṣu khaṃ vāyvagnirjalaṃ mahī|

tathāhaṃ ca manaḥprāṇabhūtendriyaguṇāśrayaḥ|| 29

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने कहा है—मैं सबका उपादान कारण होनेसे सबका आत्मा हूँ, सबमें अनुगत हूँ; इसलिये मुझसे कभी भी तुम्हारा वियोग नहीं हो सकता। जैसे संसारके सभी भौतिक पदार्थोंमें आकाश, वायु, अग्‍नि, जल और पृथ्वी—ये पाँचों भूत व्याप्त हैं, इन्हींसे सब वस्तुएँ बनी हैं, और यही उन वस्तुओंके रूपमें हैं। वैसे ही मैं मन, प्राण, पंचभूत, इन्द्रिय और उनके विषयोंका आश्रय हूँ। वे मुझमें हैं, मैं उनमें हूँ और सच पूछो तो मैं ही उनके रूपमें प्रकट हो रहा हूँ॥ २९॥

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