श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.41

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

कथं रतिविशेषज्ञः प्रियश्‍च वरयोषिताम्।

नानुबध्येत तद्वाक्यैर्विभ्रमैश्‍चानुभाजितः॥ ४१

kathaṃ rativiśeṣajñaḥ priyaśca varayoṣitām|

nānubadhyeta tadvākyairvibhramaiścānubhājitaḥ|| 41

अर्थ

तबतक दूसरी गोपी बोल उठी—‘अरी सखी! हमारे प्यारे श्यामसुन्दर तो प्रेमकी मोहिनी कलाके विशेषज्ञ हैं। सभी श्रेष्ठ स्त्रियाँ उनसे प्यार करती हैं, फिर भला जब नगरकी स्त्रियाँ उनसे मीठी-मीठी बातें करेंगी और हाव-भावसे उनकी ओर देखेंगी तब वे उनपर क्यों न रीझेंगे?’॥ ४१॥

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