श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

अन्यथा गोव्रजे तस्य स्मरणीयं न चक्ष्महे।

स्नेहानुबन्धो बन्धूनां मुनेरपि सुदुस्त्यजः॥ ५

anyathā govraje tasya smaraṇīyaṃ na cakṣmahe|

snehānubandho bandhūnāṃ munerapi sudustyajaḥ|| 5

अर्थ

अन्यथा हमें तो अब इस नन्दगाँवमें—गौओंके रहनेकी जगहमें उनके स्मरण करने योग्य कोई भी वस्तु दिखायी नहीं पड़ती; माता-पिता आदि सगे-सम्बन्धियोंका स्नेह-बन्धन तो बड़े-बड़े ऋषि-मुनि भी बड़ी कठिनाईसे छोड़ पाते हैं॥ ५॥

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