श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.57

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

दृष्ट्वैवमादि गोपीनां कृष्णावेशात्मविक्लवम्।

उद्धवः परमप्रीतस्ता नमस्यन्‍निदं जगौ॥ ५७

dṛṣṭvaivamādi gopīnāṃ kṛṣṇāveśātmaviklavam|

uddhavaḥ paramaprītastā namasyannidaṃ jagau|| 57

अर्थ

उद्धवजीने व्रजमें रहकर गोपियोंकी इस प्रकारकी प्रेम-विकलता तथा और भी बहुत-सी प्रेम-चेष्टाएँ देखीं। उनकी इस प्रकार श्रीकृष्णमें तन्मयता देखकर वे प्रेम और आनन्दसे भर गये। अब वे गोपियोंको नमस्कार करते हुए इस प्रकार गान करने लगे—॥ ५७॥

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