श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.59

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

क्वेमाः स्त्रियो वनचरीर्व्यभिचारदुष्टाः

कृष्णे क्व चैष परमात्मनि रूढभावः।

नन्वीश्‍वरोऽनुभजतोऽविदुषोऽपि साक्षा-

च्छ्रेयस्तनोत्यगदराज इवोपयुक्तः॥ ५९✎ 1174

kvemāḥ striyo vanacarīrvyabhicāraduṣṭāḥ

kṛṣṇe kva caiṣa paramātmani rūḍhabhāvaḥ|

nanvīśvaro'nubhajato'viduṣo'pi sākṣā-

cchreyastanotyagadarāja ivopayuktaḥ|| 59

अर्थ

कहाँ ये वनचरी आचार, ज्ञान और जातिसे हीन गाँवकी गँवार ग्वालिनें और कहाँ सच्चिदानन्दघन भगवान् श्रीकृष्णमें यह अनन्य परम प्रेम! अहो, धन्य है! धन्य है! इससे सिद्ध होता है कि कोई भगवान्‌के स्वरूप और रहस्यको न जानकर भी उनसे प्रेम करे, उनका भजन करे, तो वे स्वयं अपनी शक्तिसे अपनी कृपासे उसका परम कल्याण कर देते हैं; ठीक वैसे ही, जैसे कोई अनजानमें भी अमृत पी ले तो वह अपनी वस्तु-शक्तिसे ही पीनेवालेको अमर बना देता है॥ ५९॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1174 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ५ → ५९

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