उद्धवजी! हम सच कहते हैं, हमें मोक्षकी इच्छा बिलकुल नहीं है। हम भगवान्की इच्छासे अपने कर्मोंके अनुसार चाहे जिस योनिमें जन्म लें—वहाँ शुभ आचरण करें, दान करें और उसका फल यही पावें कि हमारे अपने ईश्वर श्रीकृष्णमें हमारी प्रीति उत्तरोत्तर बढ़ती रहे’॥ ६७॥✎ 16781986
कर्मभिर्भ्राम्यमाणानां यत्र क्वापीश्वरेच्छया।
मंगलाचरितैर्दानै रतिर्नः कृष्ण ईश्वरे॥ ६७
उद्धवजी! हम सच कहते हैं, हमें मोक्षकी इच्छा बिलकुल नहीं है। हम भगवान्की इच्छासे अपने कर्मोंके अनुसार चाहे जिस योनिमें जन्म लें—वहाँ शुभ आचरण करें, दान करें और उसका फल यही पावें कि हमारे अपने ईश्वर श्रीकृष्णमें हमारी प्रीति उत्तरोत्तर बढ़ती रहे’॥ ६७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.47.67 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 434) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/67/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)