श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

खगा वीतफलं वृक्षं भुक्त्वा चातिथयो गृहम्।

दग्धं मृगास्तथारण्यं जारो भुक्त्वा रतां स्त्रियम्॥ ८

khagā vītaphalaṃ vṛkṣaṃ bhuktvā cātithayo gṛham|

dagdhaṃ mṛgāstathāraṇyaṃ jāro bhuktvā ratāṃ striyam|| 8

अर्थ

जब वृक्षपर फल नहीं रहते, तब पक्षीगण वहाँसे बिना कुछ सोचे-विचारे उड़ जाते हैं। भोजन कर लेनेके बाद अतिथिलोग ही गृहस्थकी ओर कब देखते हैं? वनमें आग लगी कि पशु भाग खड़े हुए। चाहे स्त्रीके हृदयमें कितना भी अनुराग हो, जार पुरुष अपना काम बना लेनेके बाद उलटकर भी तो नहीं देखता’॥ ८॥

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