श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.48.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 48 · अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

अक्रूरभवनं कृष्णः सहरामोद्धवः प्रभुः।

किंचिच्चिकीर्षयन् प्रागादक्रूरप्रियकाम्यया॥ १२

akrūrabhavanaṃ kṛṣṇaḥ saharāmoddhavaḥ prabhuḥ|

kiṃciccikīrṣayan prāgādakrūrapriyakāmyayā|| 12

अर्थ

तदनन्तर एक दिन सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजी और उद्धवजीके साथ अक्रूरजीकी अभिलाषा पूर्ण करने और उनसे कुछ काम लेनेके लिये उनके घर गये॥ १२॥✎ 1680

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1680 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: भर-कर → भरकर

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