श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.48.16

दशम स्कन्ध · अध्याय 48 · अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

अर्चित्वा शिरसाऽऽनम्य पादावंकगतौ मृजन्।

प्रश्रयावनतोऽक्रूरः कृष्णरामावभाषत॥ १६

arcitvā śirasā''namya pādāvaṃkagatau mṛjan|

praśrayāvanato'krūraḥ kṛṣṇarāmāvabhāṣata|| 16

अर्थ

परीक्षित्! उन्होंने पहले भगवान्‌के चरण धोकर चरणोदक सिरपर धारण किया और फिर अनेकों प्रकारकी पूजा-सामग्री, दिव्य वस्त्र, गन्ध, माला और श्रेष्ठ आभूषणोंसे उनका पूजन किया, सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और उनके चरणोंको अपनी गोदमें लेकर दबाने लगे। उसी समय उन्होंने विनयावनत होकर भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीसे कहा—॥ १५-१६॥✎ 1680

यह अर्थ श्लोक 15–16 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1680 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: भर-कर → भरकर

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