॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.48.22
देहाद्युपाधेरनिरूपितत्वाद्
भवो न साक्षान्न भिदाऽऽत्मनः स्यात्।
अतो न बन्धस्तव नैव मोक्षः
स्यातां निकामस्त्वयि नोऽविवेकः॥ २२
dehādyupādheranirūpitatvād
bhavo na sākṣānna bhidā''tmanaḥ syāt|
ato na bandhastava naiva mokṣaḥ
syātāṃ nikāmastvayi no'vivekaḥ|| 22
अर्थ
प्रभो! स्वयं आत्मवस्तुमें स्थूलदेह, सूक्ष्मदेह आदि उपाधियाँ न होनेके कारण न तो उसमें जन्म-मृत्यु है और न किसी प्रकारका भेदभाव। यही कारण है कि न आपमें बन्धन है और न मोक्ष! आपमें अपने-अपने अभिप्रायके अनुसार बन्धन या मोक्षकी जो कुछ कल्पना होती है, उसका कारण केवल हमारा अविवेक ही है॥ २२॥