श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.48.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 48 · अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

भवद्विधा महाभागा निषेव्या अर्हसत्तमाः।

श्रेयस्कामैर्नृभिर्नित्यं देवाः स्वार्था न साधवः॥ ३०

bhavadvidhā mahābhāgā niṣevyā arhasattamāḥ|

śreyaskāmairnṛbhirnityaṃ devāḥ svārthā na sādhavaḥ|| 30

अर्थ

अपना परम कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंको आप-जैसे परम पूजनीय और महाभाग्यवान् संतोंकी सर्वदा सेवा करनी चाहिये। आप-जैसे संत देवताओंसे भी बढ़कर हैं; क्योंकि देवताओंमें तो स्वार्थ रहता है, परन्तु संतोंमें नहीं॥ ३०॥

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