श्रीशुकदेवजी कहते हैं—इस प्रकार अक्रूरजी महाराज धृतराष्ट्रका अभिप्राय जानकर और कुरुवंशी स्वजन-सम्बन्धियोंसे प्रेमपूर्वक अनुमति लेकर मथुरा लौट आये॥ ३०॥
इत्यभिप्रेत्य नृपतेरभिप्रायं स यादवः।
सुहृद्भिः समनुज्ञातः पुनर्यदुपुरीमगात्॥ ३०
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—इस प्रकार अक्रूरजी महाराज धृतराष्ट्रका अभिप्राय जानकर और कुरुवंशी स्वजन-सम्बन्धियोंसे प्रेमपूर्वक अनुमति लेकर मथुरा लौट आये॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.49.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 444) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/49/30/