परीक्षित्! अक्रूरजी यह जाननेके लिये कि धृतराष्ट्र पाण्डवोंके साथ कैसा व्यवहार करते हैं, कुछ महीनोंतक वहीं रहे। सच पूछो तो, धृतराष्ट्रमें अपने दुष्ट पुत्रोंकी इच्छाके विपरीत कुछ भी करनेका साहस न था। वे शकुनि आदि दुष्टोंकी सलाहके अनुसार ही काम करते थे॥ ४॥✎ 14351436
उवास कतिचिन्मासान् राज्ञो वृत्तविवित्सया।
दुष्प्रजस्याल्पसारस्य खलच्छन्दानुवर्तिनः॥ ४
परीक्षित्! अक्रूरजी यह जाननेके लिये कि धृतराष्ट्र पाण्डवोंके साथ कैसा व्यवहार करते हैं, कुछ महीनोंतक वहीं रहे। सच पूछो तो, धृतराष्ट्रमें अपने दुष्ट पुत्रोंकी इच्छाके विपरीत कुछ भी करनेका साहस न था। वे शकुनि आदि दुष्टोंकी सलाहके अनुसार ही काम करते थे॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.49.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 440) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/49/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1435 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हस्तिनापुर-वासियोंके → हस्तिनापुरवासियोंके