श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.50.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 50 · अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

जरासुतस्तावभिसृत्य माधवौ

महाबलौघेन बलीयसाऽऽवृणोत्।

ससैन्ययानध्वजवाजिसारथी

सूर्यानलौ वायुरिवाभ्ररेणुभिः॥ २१

jarāsutastāvabhisṛtya mādhavau

mahābalaughena balīyasā''vṛṇot|

sasainyayānadhvajavājisārathī

sūryānalau vāyurivābhrareṇubhiḥ|| 21

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! जैसे वायु बादलोंसे सूर्यको और धूएँसे आगको ढक लेती है, किन्तु वास्तवमें वे ढकते नहीं, उनका प्रकाश फिर फैलता ही है; वैसे ही मगधराज जरासन्धने भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामके सामने आकर अपनी बहुत बड़ी बलवान् और अपार सेनाके द्वारा उन्हें चारों ओरसे घेर लिया—यहाँतक कि उनकी सेना, रथ, ध्वजा, घोड़ों और सारथियोंका दीखना भी बंद हो गया॥ २१॥✎ 1999 2108

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1999 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): दीप- → द्वीप-
  • #2108 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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