श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.50.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 50 · अथ पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

सुपर्णतालध्वजचिह्नितौ रथा-

वलक्षयन्त्यो हरिरामयोर्मृधे।

स्त्रियः पुराट्टालकहर्म्यगोपुरं

समाश्रिताः संमुमुहुः शुचार्दिताः॥ २२

suparṇatāladhvajacihnitau rathā-

valakṣayantyo harirāmayormṛdhe|

striyaḥ purāṭṭālakaharmyagopuraṃ

samāśritāḥ saṃmumuhuḥ śucārditāḥ|| 22

अर्थ

मथुरापुरीकी स्त्रियाँ अपने महलोंकी अटारियों, छज्जों और फाटकोंपर चढ़कर युद्धका कौतुक देख रही थीं। जब उन्होंने देखा कि युद्धभूमिमें भगवान् श्रीकृष्णकी गरुड़चिह्नसे चिह्नित और बलरामजीकी तालचिह्नसे चिह्नित ध्वजावाले रथ नहीं दीख रहे हैं, तब वे शोकके आवेगसे मूर्च्छित हो गयीं॥ २२॥✎ 1999 2108

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1999 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): दीप- → द्वीप-
  • #2108 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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