पुरुषश्रेष्ठ! यदि आपको रुचे तो हमें अपना जन्म, कर्म और गोत्र बतलाइये; क्योंकि हम सच्चे हृदयसे उसे सुननेके इच्छुक हैं॥ ३१॥
शुश्रूषतामव्यलीकमस्माकं नरपुंगव।
स्वजन्म कर्म गोत्रं वा कथ्यतां यदि रोचते॥ ३१
पुरुषश्रेष्ठ! यदि आपको रुचे तो हमें अपना जन्म, कर्म और गोत्र बतलाइये; क्योंकि हम सच्चे हृदयसे उसे सुननेके इच्छुक हैं॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.51.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 456) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/51/31/