श्रीशुकदेवजी कहते हैं—जब भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार कहा, तब राजा मुचुकुन्दको वृद्ध गर्गका यह कथन याद आ गया कि यदुवंशमें भगवान् अवतीर्ण होनेवाले हैं। वे जान गये कि ये स्वयं भगवान् नारायण हैं। आनन्दसे भरकर उन्होंने भगवान्के चरणोंमें प्रणाम किया और इस प्रकार स्तुति की॥ ४५॥
इत्युक्तस्तं प्रणम्याह मुचुकुन्दो मुदान्वितः।
ज्ञात्वा नारायणं देवं गर्गवाक्यमनुस्मरन्॥ ४५
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—जब भगवान् श्रीकृष्णने इस प्रकार कहा, तब राजा मुचुकुन्दको वृद्ध गर्गका यह कथन याद आ गया कि यदुवंशमें भगवान् अवतीर्ण होनेवाले हैं। वे जान गये कि ये स्वयं भगवान् नारायण हैं। आनन्दसे भरकर उन्होंने भगवान्के चरणोंमें प्रणाम किया और इस प्रकार स्तुति की॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.51.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 457) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/51/45/